वैदिक ज्योतिष के शब्द जिन्हें आपको जानना चाहिए

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वैदिक ज्योतिष समाज के कल्याण के लिए अपने साथ बहुत सारी जानकारियां लाता है और ज्योतिषी उपयोगी
जानकारी बाहर निकालने के लिए ज्ञान के इस विशाल सागर में हमेशा गोते लगाते रहते हैं, जिसका समाज द्वारा
इस्तेमाल किया जा सकता है। इस अनंत खोज में, हम ज्योतिषियों को अलग-अलग वैदिक शास्त्र और ग्रंथ मिलते हैं
जो विभिन्न धारणाओं, परिभाषाओं, गणनाओं आदि के इस्तेमाल के बारे में बताते हैं। जो एक-दूसरे के विरोधाभासी
हो सकते हैं, लेकिन फिर भी आश्चर्यजनक तरीके से एक समान निष्कर्षों की ओर इशारा करते हैं।

गणनाओं में सटीकता लाने में कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए और ऐसा कोई भी सिद्धांत नहीं छोड़ना चाहिए जिसकी
वजह से भविष्यवाणी की सटीकता बढ़ सकती है। हालाँकि, किसी एक भविष्यवाणी के लिए सभी धारणाओं को
शामिल करना ज्यादातर समय मुमकिन नहीं होता, इसलिए यहाँ मैंने वैदिक ज्योतिष से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण शब्दों
और उनकी महत्ता के बारे में बताने की कोशिश की है:

आत्मकारक: जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि यह आत्मा का कारक है। आत्मा का कारक होने के नाते यह अपने
आप सबसे महत्वपूर्ण ग्रह बन जाता है जो जातक के विवेक को नियंत्रित करता है और इसलिए अपनी पूरी ज़िन्दगी में
उसके द्वारा किये गए फैसलों को नियंत्रित करता है। यह उस रास्ते का फैसला करता है जिसपर जातक चलेगा और
अपने जीवनकाल में मोक्ष पाने के कितना करीब आएगा। आत्मकारक 2 प्रकार के होते हैं:

  1. प्राकृतिक आत्मकारक – सूर्य सभी जन्म कुंडलियों में निश्चित प्राकृतिक आत्मकारक है, इसलिए इसे ग्रहों का राजा भी कहते हैं।
  2. चर आत्मकारक – परिवर्तनशील आत्मकारक, अच्छे परिणाम देने के लिए कुंडली में चर आत्मकारक का मजबूत
    होना ज़रूरी होता है क्योंकि अगर राजा शक्तिशाली नहीं होता तो उसके फैसले उसकी प्रजा के फैसलों पर भी असर डालेंगे।

आत्मकारक सबसे ज्यादा अनुदैर्ध्य अंश वाला ग्रह होता है। इस गणना के लिए केतु को छोड़कर सभी 8 ग्रहों पर विचार किया जाता है, क्योंकि केतु खुद मुक्ति को दर्शाता है। राहु हमेशा पीछे की ओर चलता है (सैद्धांतिक रूप से), इसलिए इसका अंश मौजूदा अंश को 30 से घटाकर जोड़ा जाता है। आत्मकारक की गणना, इष्ट देवता और करियर की संभावनाएं खोजने का आधार भी बनाती है।

अमात्यकारक: अगर आत्मकारक ग्रहों में राजा है तो अमात्यकारक मंत्री होना चाहिए। जातक पर इसका जितना
नियंत्रण होता है, उसके आधार पर यह दूसरा सबसे महत्वपूर्ण ग्रह होता है। जहाँ आत्मकारक आत्मा का कारक है,
वहीं अमात्यकारक कर्म, बुद्धि, धन आदि का कारक है। यह 2रे, 5वें, 9वें और 10वें भाव को नियंत्रित करता है जो
क्रमशः जातक की अपने से कमाई गयी संपत्ति, शिक्षा/बुद्धि, भाग्य और करियर को दर्शाते हैं। जातक के करियर की
संभावनाओं का आकलन करने में अमात्यकारक की स्थिति बहुत महत्वपूर्ण होती है। अमात्यकारक की गणना
आत्मकारक के समान की जाती है और दूसरा सबसे ज्यादा अनुदैर्ध्य अंश वाला ग्रह अमात्यकारक होता है।

गुलिक: राहु/केतु के समान भौतिक विशेषताएं रखने वाला गुलिक #ज्योतिष में एक सैद्धांतिक बिंदु है जिसका कोई
भौतिक अस्तित्व नहीं होता फिर भी जन्म #कुंडली में इसके प्रभावों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। वैदिक
ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार इसे शनि का पुत्र माना जाता है और इसके समान बुरे प्रभाव होते हैं। गुलिक एक उपग्रह है
जिसे जन्म कुंडली में सबसे बुरी चीज माना जाता है। वर्तमान में, विभिन्न ग्रहों और भावों के संबंध में गुलिक के
प्रभावों पर बात करना संभव नहीं है, लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि गुलिक जिस भी स्थान पर बैठा होता है वहां
अपना बुरा प्रभाव डालता है।

वक्री: यह ज्योतिष की सबसे विवादित अवधारणों में से एक है। वक्री को वक्री ग्रहों की अवधारणा के रूप में जाना
जाता है। जहाँ वक्री होने की घटना को सभी ज्योतिषी मानते और स्वीकार करते हैं, वहीं इसके प्रभावों की व्याख्या के
संबंध में कई विवाद हैं। वक्री ग्रह एक दृष्टि-भ्रम हैं, और यह तब होता है जब अवलोकन बिंदु के रूप में पृथ्वी के सापेक्ष

ग्रह पीछे की दिशा में जाते हुए दिखाई देते हैं। एक-दूसरे के संबंध में दोनों ग्रहों की सापेक्ष गति में अंतर के कारण ऐसा
होता है। वैदिक ज्योतिष में, इस भ्रम को वास्तविक घटना के रूप में माना जाता है और गणना के सभी उद्देश्यों के
लिए यह ग्रह के पीछे की दिशा में जाने से संबंधित होता है। इससे वक्री ग्रहों के प्रभावों की अलग-अलग व्याख्या
निकलकर सामने आते हैं, जिनमें से कुछ को यहाँ शामिल किया गया है:
1. कुछ विचारधाराओं के अनुसार पीछे की ओर जाने के कारण ग्रह अपनी प्रकृति और स्थिति के विपरीत फल
देते हैं।
2. कुछ कहते हैं कि धीमी स्थिति में होने के कारण वक्री ग्रहों के प्रभाव जन्म कुंडली में उससे कहीं ज्यादा समय
तक रहते हैं जितना कि उन्हें रहना चाहिए।
3. कुछ ज्योतिषी मानते हैं कि वक्री होने पर, सैद्धांतिक रूप से, ग्रह पृथ्वी के सबसे करीब होते हैं इसलिए
उनका प्रभाव (अच्छा या बुरा) सबसे ज्यादा होता है।
4. ज्योतिषियों का ऐसा भी मानना है कि वक्री ग्रह अपनी दशा की शुरुआत में बहुत ज्यादा बुरे फल देते हैं
लेकिन दशा के उत्तरार्ध में बहुत अच्छे फल देते हैं।

उपरोक्त अलग-अलग धारणाओं को ध्यान में रखने पर विभिन्न भावों में वक्री ग्रहों के प्रभावों की सूची बहुत बड़ी हो
जाती है। इसलिए जहाँ तक वक्री ग्रहों की अवधारणा की बात आती है, अलग-अलग विश्वासों पर आश्रित होने के
बजाय अपने खुद के अनुभव से कुंडली पर विचार करना सबसे अच्छा होता है।

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