ज्योतिष में इष्ट देवता का महत्व

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क्या आपको पता है; कि वैदिक ज्योतिष के इस्तेमाल से आपकी कुंडली से भी आपके इष्ट देवता का पता लगाया जा
सकता है? सनातन धर्म, जिसे ज्यादातर लोग “हिंदुत्व” कहते हैं, पर-ब्रह्म की अवधारणा का समर्थन करता है। अद्वैत
वेदांत नामक दर्शन सर्वोच्च शक्ति को “निर्गुण ब्रह्म” के रूप में निराकार बताता है; जहाँ हर संप्रदाय में सर्वोच्च शक्ति के
अस्तित्व के विचार और व्याख्या अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन मूल में, सभी यह स्वीकार करेंगे कि एक ऐसी ऊर्जा
या सर्वश्रेष्ठ शक्ति मौजूद है जो संसार में होने वाली हर एक घटना को नियंत्रित करती है।

“सर्वोच्च शक्ति” की जटिल अवधारणा से ज्यादा बेहतर तरीके से समझने में मदद करने के लिए, मानव जाति के लिए
विभिन्न अभिव्यक्तियाँ प्रस्तुत की गयी हैं जिन्हें हम देवी-देवता कहना पसंद करते हैं। हर एक अभिव्यक्ति का एक
उद्देश्य या क्षेत्र है, जिसपर इसका नियंत्रण होता है या जिससे जुड़ी गतिविधियों को यह नियंत्रित करता है। वैदिक
ज्योतिष में इस तर्क को ध्यान में रखते हुए हमारे पास एक “इष्ट देवता” होते हैं; जो जीवन में तरक्की और ज्ञान पाने में
लोगों की मदद करते हैं।

इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि वैदिक #ज्योतिष में; प्रत्येक राशि को सांसारिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए इष्ट
देवना प्रदान नहीं किया गया है; और किसी भी लग्न या राशि के लोगों को यह नहीं सोचना चाहिए कि अपने इष्ट
देवता की पूजा करने पर उन्हें भौतिक लाभ या शक्तियां पाने में मदद मिलेगी; सामान्य तौर पर, इष्ट देवता बताने का
एकमात्र उद्देश्य लोगों को अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाने के लिए प्रोत्साहित करना है, जिसके लिए उन्हें एक
केंद्र बिंदु की ज़रूरत होती है; अगर अपने इष्ट देवता की पूजा करने पर आपकी ऊर्जा सही दिशा में लगती है तो यह
निश्चित है कि आप इस भौतिकवादी दुनिया के सामान्य कोलाहल से ऊपर उठ जायेंगे और मोक्ष प्राप्त करेंगे।

इष्ट देवता का पता लगाने की प्रक्रिया में D9 (नवमांश) शामिल है; जिसे “धर्म” #कुंडली के रूप में भी जाना जाता है।
इसके बाद हम कारकांश लग्न पर विचार करते हैं; जो D9 कुंडली में आत्मकारक की राशि की स्थिति है। कारकांश से
12वां भाव (आत्मा की मुक्ति का भाव) इष्ट #देवता का पता लगाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

इसलिए, धर्म और मोक्ष के भावों/कुंडलियों का समावेश ज्योतिष में इष्ट देवता की प्रासंगिकता को दर्शाता है।

इष्ट देवता का पता लगाने की सही विधि नीचे दी गयी है:

चरण 1 – सबसे पहले D1 कुंडली में सबसे ज्यादा अंश वाले ग्रह का पता लगाया जाता है; जिसे राशि या लग्न कुंडली
के रूप में भी जाना जाता है। इसके अलावा; सबसे ज्यादा अंश वाले ग्रह को “आत्मकारक” कहा जाता है जो आपके
आत्मा के मार्गदर्शक के रूप में काम करता है; और दूसरे शब्दों में कहें तो आत्मा का कारक है। अगर दो ग्रहों के मिनट
समान हैं तो ज्यादा सेकंड वाले ग्रह को आत्मकारक के रूप में मानें।

चरण 2 – आत्मकारक का पता चलने के बाद, D9 (नवमांश) कुंडली पर जाएँ और उस राशि को देखें जिसमें
आत्मकारक मौजूद है। D9 (नवमांश) कुंडली में इस स्थान को कारकांश कहा जाता है।

चरण 3 – कारकांश से 12 भाव आगे जाएँ जिस प्रकार से D9 कुंडली में निर्धारित किया गया है; और उस भाव में ग्रहों
की स्थिति का आकलन करें। इस भाव को “जीवनमुक्तांसा” या वो भाव कहा जाता है जो आत्मा की मुक्ति नियंत्रित
करता है और मोक्ष पाने में आपकी मदद करता है।

जीवनमुक्तांसा का आकलन करने पर निम्नलिखित तीन स्थितियों में एक उत्पन्न हो सकती है:

स्थिति 1 – भाव में एक ग्रह है
निष्कर्ष – संबंधित देवता इष्ट देवता होंगे।

स्थिति 2 – भाव में 1 से ज्यादा ग्रह हैं

निष्कर्ष – यह पता लगाने के लिए कि कौन सा ग्रह सबसे शक्तिशाली है हमें शदबाला प्रणाली, ग्रह संबंधी शत्रुताओं के
सभी कारकों पर विचार करना पड़ेगा और इसके बाद संबंधित देवता इष्ट देवता होंगे।

स्थिति 3 – भाव खाली है
निष्कर्ष – भाव की ग्रह संबंधी दृष्टियों की जांच करें; अगर भाव पर किसी अन्य ग्रह की दृष्टि है तो इसका स्वामी इष्ट
देवता को परिभाषित करेगा, नहीं तो जीवनमुक्तांसा राशि या राशि का स्वामी यह फैसला करने में हमारी मदद
करेगा। अगर एक से ज्यादा ग्रह की दृष्टि होती है तो उनमें से सबसे शक्तिशाली ग्रह का प्रयोग करें।

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