क्या ज्योतिष लोगों को भाग्यवादी बनाता है?

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ज्योतिष को मानने वाले जहां इसे एक उपयोगी विज्ञान मानते हैं, वहीं इसके विरोधी इस बात से सीधे तौर पर इंकार करते हैं कि हज़ारों-लाखों मील की दूरी पर स्थित ग्रहों का आदमी की रोजमर्रा की ज़िन्दगी पर कोई भी असर पड़ सकता है। ज्योतिष पर जो सबसे बड़ा आरोप लगता है, वह यह है कि यह लोगों को अपने कर्मों पर भरोसा करने के बजाय भाग्यवादी बनता है। इस आरोप में कितनी सच्चाई है या फिर ज्योतिष समर्थकों के दावे कितने मजबूत हैं, आज हम इसी की पड़ताल दोनों तरफ से पेश किए जाने वाले तर्कों और तथ्यों की चर्चा के माध्यम से करेंगे।

ज्योतिष पर कोई भी चर्चा करने से पहले यह जान लेना उपयोगी रहेगा कि आखिर इस विधा की शुरुआत कैसे हुई या यूं कहें कि यह बला आखिर आई कहां से ? दरअसल हज़ारों साल पहले इंसान  ने जब आकाश में दिखाई देने वाले तारों, ग्रह-नक्षत्रों पर कुछ गहराई से गौर करना शुरू किया तो उसे इनकी स्थिति में एक तारतम्य और एक सुनिश्चित पैटर्न सा दिखाई दिया। आदमी को समझ में आया की आकाश में नज़र आने वाले यह पिंड बस यूं ही अपनी मर्ज़ी से इधर-उधर नहीं भटकते फिर रहे हैं, बल्कि ये एक सुनिश्चित क्रम या नियमों में बंधे हुए हैं। इसके बाद आकाशीय पिंडों की इन स्थितियों का असर भी उसे अपने इर्द-गिर्द की दुनिया और अपने जीवन पर पड़ता हुआ सा नज़र आने लगा। धीरे-धीरे आदमी ने अपने इन आकलनों की गहराई में उतरना और उन्हें व्यवस्थित करना शुरू किया। बस यहीं से ज्योतिष शास्त्र की शुरुआत होती है। धीरे-धीरे ग्रहों-नक्षत्रों की चाल  को  समझ में आने लगी और वह अपने आस-पास की घटनाओं को इनकी स्थितियों और गतिविधियों से जोड़ने लगा। आदमी की इन कोशिशों से आगे चलकर ज्योतिष अपने आप में एक अलग शास्त्र बन गया, जिसका दायरा समय के साथ और भी बढ़ता गया और आज भी बढ़ रहा है।

अब लौटते हैं हम उस मूल सवाल पर कि क्या ज्योतिष इंसान को भाग्यवादी बनाता है?  यानि उसकी सोच को ऐसा बना देता है कि जो होना है, सो तो होकर ही रहेगा क्योंकि यह सब पहले से ही तय है।  इसके जवाब में ज्योतिष समर्थक तर्क देते हैं कि ग्रहों की स्थितियों का हम पर ठीक वैसे ही असर पड़ता है जैसे कि अमावस व पूर्णिमा पर चंद्रमा के धरती के पास व दूर होने पर समुद्र में ज्वार−भाटा आता है। ज्वार आने पर बहुत से लोगों को सिरदर्द, बेचैनी, रक्तचाप की समस्या महसूस होती है। इसी तरह अन्य ग्रहों की स्थितियों में बदलाव का भी हम पर असर पड़ता है। ज्योतिष शास्त्र इन प्रभावों से हमें आगाह करने व यथासंभव बचाव करने में मदद करता है। इंसान कुछ उपायों को करके इन प्रभावों को कम कर सकता है या इनसे बच सकता है। इस तरह ज्योतिष नियति या भाग्य का कर्म के साथ समन्वय बैठाने का काम करता है, न कि इंसान को भाग्यवादी बनाता है। अपरोक्ष रूप से ज्योतिष बुरे प्रभावों से बचकर अपने कर्म−पथ पर आगे बढ़ते रहने का रास्ता दिखाता है। इस नज़रिये से देखा जाए तो ज्योतिष कर्म एवं भाग्य के बीच सेतु का काम करता है। यह लोगों को कर्म से विरत करने के बजाय यह सुझाता है कि कौन सा कर्म किस समय करना उचित या अनुचित है व कब उस कर्म को करने से सबसे बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण, संक्रांति जैसी घटनाओं के बारे में ज्योतिष हजारों वर्षों से सटीक जानकारी देता आ रहा है। तब से, जब किसी भी प्रकार की दूरबीन, राकेट, उपग्रह, कैल्कुलेटर या कंप्यूटर जैसे आधुनिक उपकरणों का आविष्कार तक नहीं हुआ था। इस तरह, हजारों साल से कारगर साबित हो रही इस विधा को आज दरकिनार कर इसकी उपयोगिता से इंकार कैसे किया जा सकता है? खुद ज्योतिष विधा का नाम भी कहीं न कहीं उसके इस गुण−धर्म को परिलक्षित करता है, जिसके मुताबिक यह मानव को ज्योति अर्थात प्रकाश यानी कि रास्ता दिखाने वाला विज्ञान है। इस तरह हम देखते हैं कि ज्योतिष कर्म को भाग्य से जोड़कर दोनों के बीच एक समन्वय बनाने का मार्ग दिखाता है। भागवत महापुराण में भी कहा गया है कि-

“उद्यमं साहसं धैर्यं बुद्धि शक्ति पराक्रम:।

षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैव सहायकृत” ।।

इसका अर्थ यह है कि यदि आप चाहते हैं कि आपका भाग्य सौभाग्य में बदलें तो उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम को अपनाएं। ऐसा करने पर ही ईश्वर आपकी मदद करेंगे।

इस बारे में एक रोचक वाक़या है। करीब दो दशक पहले सन 2000 में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने अपने पाठ्यक्रम में एक विषय के रूप में ज्योतिष को शामिल किया, तो एक तबके ने इसका बड़ा मुखर विरोध किया। इनमें देश के कई नामी वैज्ञानिक भी शामिल थे। इन लोगों ने इस फैसले को अदालत में चुनौती दी। उस समय प्रख्यात ज्योतिषी के. एन. राव ने जोरदार ढंग से अदालत में ज्योतिष का पक्ष रखा। उन्होंने पहले बॉम्बे कोर्ट में, फिर आंध्र हाई कोर्ट में पैरवी की और सुप्रीम कोर्ट में भी जीत हासिल की। अदालत ने ज्योतिष के वैज्ञानिक पक्ष को स्वीकार करते हुए इसे यूजीसी के पाठ्यक्रम में एक विषय के रूप में मान्यता दी।

राव साहब का कहना है कि कुछ ज्योतिषी गलत हो सकते हैं, पूरी ज्योतिष नहीं। इसिलए कुछेक लोगों की वजह से पूरी विधा पर सवाल उठाना या उसे नकारना सही नहीं।

वास्तव में इतिहास में ऐसी कई घटनाओं का उल्लेख है, जो ज्योतिष के महत्व को रेखांकित करती हैं। मुगल काल के ऐतिहासिक ग्रंथ जहांगीरनामा के मुताबिक अकबर के दरबार में ज्योतिक राय नाम के ज्योतिषी थे, जो आगे चलकर उनके पुत्र जहांगीर के दरबार में भी रहे। उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि राजकुमार (सलीम) जहांगीर नदी में डूब जाएंगे, लेकिन उसकी जान नहीं जाएगी। 27 मार्च 1620 को ऐसा ही हुआ। जहांगीर की बेगम की मृत्यु की भविष्यवाणी भी ज्योतिक राय ने दो महीने पहले ही कर दी थी। इसी तरह 16वीं शाताब्दी (1503) में फ्रांस में जन्मे विश्वविख्यात ज्योतिष शास्त्री नेस्ट्रोडॉमस की सदियों पहले की गई सटीक भविष्यवाणियों का ज़िक्र किए बिना तो इस विषय पर चर्चा अधूरी ही रह जाएगी। नेस्ट्रोडॉमस की इन भविष्यवाणियों के सामने आने पर उन आधुनिकतावादी देशों के लोग भी ज्योतिष की सार्थकता पर विचार करने को मजबूर हुए, जो इसे कोरा अंधविश्वास कह कर नकारते आए थे।

ज्योतिष को मार्गदर्शन की तरह देखा जाना चाहिए जो आपको कर्म चुनने में मदद करता है ना कि भाग्य के भरोसे बैठने को कहता है। 

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1 comment
  1. रोचक आलेख के लिए लेखक धनंजय जी को बधाई।👍

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